अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकारी रोक


||अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकारी रोक||


देश के जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ताओं को अयोध्या जाने वाले रास्ते ही रौनाही स्थान पर ही रोक दिया गया है। वे यथा स्थान पर ही धरने पर बैठ गये हैं। ये सामाजिक कार्यकर्ता कश्मीर के लोगो के समर्थन में उिल्ली स्थित मोमबत्ती प्रदर्शन करना चाहते थे और बाद में अयोध्या में होने वाले दो दिवसीय साम्प्रदायिक सद्भावना शिविर में भाग लेना चाह रहे थे। मगर ऐसे कार्यकर्ताओं पर सरकारी खुपिया ऐजेसियों की तीखी नजर बनाई हुई है और अन्ततः उन्हे नजरबन्द किया गया।


एडवोकेट मोहम्मद शोएब, संदीप पाण्डेय, मुम्बई से आए प्रोफेसर राम पुनियानी, राजीव यादव, हफीज किदवई व अन्यो को लखनऊ-अयोध्या मार्ग पर स्थित रौनाही में रोक दिया है। जबकि अयोध्या के आयोजक महंत युगल किशोर शास्त्री को भी गिरफ्तार किया गया है। अब वे लोग यथा स्थान पर ही धरने पर बैठ गये है। उनका आरोप है कि अयोध्या जाने के लिए देश भर से आए शिविरार्थियों को धमकी मिल रही है, उनके ऊपर दबाव डाला जा रहा है। इसलिए वे केन्द्र सरकार की इन हरकतो का पुरजोर विरोध करते हैं।


प्रोफेसर प्रताप भानु मेहता का कहना है केन्द्र सरकार ने हाल में जम्मू कश्मीर को पूरी तरह भारत में मिलाने का जो फैसला लिया है यह कश्मीर का भारतीयकरण करने के बजाए भारत का कश्मीरीकरण कर देना जैसा है। कश्मीर में लोगों के नागरिक अधिकारों का हरण कर लिया गया है, व अभिव्यक्ति की आजादी पर पूरी तरह रोक लगी हुई है। श्रीनगर में तो मीडिया पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है और समाचार पत्र तक प्रकाशित नहीं हो पा रहे हैं। उन्होने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि जम्मू-कश्मीर के बाहर भी भारत के अन्य हिस्सों में कश्मीर के सवाल पर यदि कोई सरकार से अलग राय रखता है तो उसे नहीं बोलने दिया जाएगा और कोई कार्यक्रम नहीं करने दिया जाएगा। 


सवाल इस बात का है कि सिर्फ कश्मीर के सवाल पर ही नहीं अयोध्या में दो दिन की साम्प्रदायिक सद्भावना बैठक पर भी रोक लगा दी गई है। ऐसा लगता है कि अन्य विषयों पर अर्थात जिसमें भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राय से अलग राय रखी जाने वाले कार्यक्रमो पर भी रोक लगा दी गई है। कार्यकर्ताओ का कहना है कि यह तो आपातकाल जैसी परिस्थिति जान पड़ती है। देश के लिए यह संकेत ठीक नहीं है। यदि जनता इसका विरोध नहीं करेगी तो कल उनके अधिकारों के भी हरण का खतरा भी सामने होगा है।


इधर हालात स्पष्ट नजर आ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के लोगों पर उनकी इच्छा के विरुद्ध, बिना उनकी राय लिए, लोकतंत्र की मौलिक अवधारणा को धता बताते हुए, एक फैसला थोप दिया गया है। माना जम्मू-कश्मीर के बावत फैसला सही भी ठहराया जाए तो उसके लेने का तरीका तो गलत ही है। अतएव भविष्य में यह सरकार इस तरह के निर्णय अन्य राज्यों के लिए भी ले सकती है। इसलिए सरकार की तानाशाही का विरोध किया जाना जरूरी है।


बता दें कि भले ही नरेन्द्र मोदी ने पूर्ण बहुमत से दूसरी बार सरकार का गठन कर लिया हो, किंतु लोकतंत्र में बड़े फैसले जो लोगों का जीवन प्रभावित करने वाले हैं, जैसे नोटबंदी, आदि मनमाने तरीके से नहीं लिए जा सकते। उनके ऊपर बहस और आम सहमति बनाना जरूरी है। भारतीय जनता पार्टी को याद रखना चाहिए की उसे देश भर में सिर्फ 37.4 प्रतिशत मतदाताओं का ही समर्थन प्राप्त है। वह यह मान कर नहीं चल सकती कि देश के सभी लोग उसके सभी निर्णयों के साथ हैं। बल्कि बहुमत भी उनके साथ नहीं है।


एडवोकेट मोहम्मद शोएब, राजीव यादव, संदीप पाण्डेय, रिहाई मंच, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया), लोक राजनीति मंच, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक के एजेण्डे को पूरे देश पर थोपना चाहती है जो पूर्णतया गैर-लोकतांत्रिक कहा जा सकता है। जबकि वे इस देश में लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए संकल्पबद्ध हैं और भाजपा सरकार के गैर-लोकतांत्रिक तरीकों के खिलाफ संघर्ष करते रहेंगे।