पानी का उपयोग और विधियां

||पानी का उपयोग और विधियां|| 


आजकल पानी की समस्या गहराती ही जा रही है। पीने का पानी हो या सिचाई का। मसलन देखा गया है कि हम लोग पानी का उपयोग व्यवस्थित रूप से नहीं करते है। आइये कैसे करें पानी का उपयोग, विशेषकर सिंचाई को लेकर। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट 


सिंचाई की प्रमुख विधियाँ


आमतौर पर किसी फसल अथवा खेत में पानी दिये जाने के तरीके का सिंचाई की विधि कहा जाता है। सिंचाई की वैज्ञानिक विधि का मतलब ऐसी सिंचाई होता व्यवस्था से होता है जिसमें सिंचाई जल कम साथ उत्पाइदन के अन्य आवश्यक लागतों का प्रभावकारी उपयोग एवं फस्लोत्पादन में वृद्धि हो सके ।सिंचाई की सबसे उतम विधि वह होती है जिसमें जल एक समान वितरण होने के साथ ही साथ पानी का कम नुुकसान होता है और अधिक से अधिक क्षेत्रसींचा जा सकता हैै । इस प्रकार मुख्य रुप से सिंचाई की प्रमुख तीन विधियाँ हैः-


1ण्       सतही सिंचाई विधि: सिंचाई जल को भूमि के तल पर फैलाना तथा जल के अन्तःसरण का अवसर प्रदान करना सतही सिंचाई कहलाती है।


2-  बौछारी सिंचाई विधिः सिंचाई जल का वायुमण्डल में छिड़काव करना तथा वर्षा की बूंदो की तरह भूमि और पौधों पर गिरने देना बौछारी सिंचाई कहलाता है।


3- अवभूमी सिंचाईः सिंचाई जल को सीधे पेड़ के जड़ क्षेत्र में पहुंचाना ही अवभूमि सिंचाई, बूंद-बूंद सिंचाई अथवा टपक सिंचाई के नाम से जाना जाता है।


इन वैज्ञानिक सिंचाई विधियों के विषय में कृषकों को जागरूक करना अन्यन्त आवश्यक है, जिससे कम जल से अधिकाधिक क्षेत्र की उपयोगी सिंचाई की जा सके। सिंचाई की विधियों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है-


सतही सिंचाई विधि


सतही विधि की प्रमुख विधियाँ निम्नवत  है:-


(अ) बाॅर्डर सिंचाई विधि-


इसके अन्तर्गत खेत में लम्बाई में ढाल की दिशा की ओर कई पट्टियों में विभाजित कर लिया जाता है। पानी के स्रोत को खेत में ऊँचे छोर चर रखा जाता है तथा बहाव हेतु पट्टियाँ ढाल की दिशा में बनाई जाती हैं यह विधि सिंचाई के लिये सबसे आसान विधि है इस विधि के अन्तर्गत पट्टियों की लम्बाई बहाव एवं ढाल निम्नवत् निधारित किये जाये -


क्र.सं.    भूमि का प्रकार   पट्टी की अधिकतम लम्बाई (मीटर में)       सुरक्षित बहाव हेतु ढाल का प्रतिशत


01        बलुई दोमट        20-100 0.25-0.66


02        दोमट भूमि        100-180           0.02-0.40


03        चिकनी एवं चिकनी दोमट           100-180           0.02-0.40


पट्टी की लम्बाई खेत की लम्बाई के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए।


(ब) चेक बेसिन सिंचाई विधिः यह विधि भारी मृदा वाले क्षेत्र में, जहां इंफिल्ट्रशन दर कम होती है और सिंचाई के पानी को अधिक दिन तक रोका जाना आवश्यक हो, वहां यह विधि अधिक उपयुक्त है। यह विधि समतल भूमि के लिए अधिक उपयोगी है। इस विधि का  उपयोग आयताकार या सम्मोच रेखीय आधार पर विभक्त खेतों के लिए किया जाता है। बेसिन में पानी कि बहाव की दर को नियंत्रित करके, फील्ड कैपासिटी स्तर पर रूट जोन में नमी पहुंचा कर इस विधि से कुशल सिंचाई की जा सकती है।


(स) कूँड़ सिंचाई विधि-


यह विधि लाईन में बोई जाने वाली फसलों, यथा मक्का, ज्वार, गन्ना, कपास, मूँगफली, आलू, तथा साग-सब्जियों की सिंचाई के लिए अधिक उपयोगी हैं। इस विधि के अन्र्तगत कूँड़ में उपलब्ध जल से कूँड़ के बगल में रिट पर बोयी गयी फसलों को रिस-रिस कर नमी प्राप्त होती है। छोटी फसलों के लिए कूँड़ की गहराई 7-12 से0 मी0 तथा बडी़ उगने वाली फसलों एवं बागवनी के लिए कूँड़ की गहराई 25 सेमी0 तक रखी जाती है। कूँड़ में ढाल 0.05 प्रतिशत रखा जाता है। कूँड़ की लम्बाई-चैडा़ई के आधार पर निश्चित की जाती है। अधिक लम्बी कूँड़ समुचित सिंचाई हेतु उत्तम मानी जाती है।


सतही सिंचाई से हानियाँ:


ऽ          सतही सिंचाई विधि में जल उपयोग दक्षता कम हो जाती है।


ऽ          इस विधि से जल की काफी मात्रा की क्षति होती है।


ऽ          इस विधि द्वारा खेत में अधिक पानी दिये जाने के कारण जल स्तर की वृद्धि एवं निछालन क्रिया द्वारा पोषक तत्वों के नष्ट होने की संभावना रहती है।


ऽ          आवश्यकता से अधिक पानी दिये जाने के कारण जलभराव होने तथा भूमि के ऊसर बनने की सम्भावना रहती है।


भूमिगत सिंचाई


भूमिगत सिंचाई प्रणाली के अन्र्गत भूमितगत पाइप लाइन, टाइल डेªन या मोल डेªन का प्रयोग किया जाता हैं। इस विधि में 0.5 से 1 मीटर गहरी तथा 15 से 30 मीटर दूरी पर खाई खोद कर पाइप लाइन .... डेªन स्थापित की जाती है। भूमि की बनावट एवं पौधांे के जड़ की गहराई के अनुसार इसमें पानी की सतह बरकरार रखी जाती है। पानी कैपिलरी एक्शन द्वारा पौधों को उपलब्ध होता है। यह विधि ऐसी भूमि के लिए उपयोगी है, जिनमें पानी धारण क्षमता (वाटर होल्डिंग कैपासिटी) कम होती है ताकि इनफिल्ट्रेशन दर अधिक होती है। यह विधि औद्योनिकी फसलों के लिए अधिक उपयोगी मानी जाती है।


स्प्रिंकलर (बौछारी) सिंचाई विधि


इस विधि के अन्र्तगत पानी को नाजल के द्वारा हवा में स्प्रे किया जाता है जो भूमि की सतह पर एक समान रूप से गिरता है तथा धीरे-धीरे पौधों की जड़ तक प्रवेश करता है। पानी का दबाव ट्यूब द्वारा नाजल तक पम्पिंग करके बनाया जाता है। इस विधि से जहां एक ओर कम पानी  में पर्याप्त सिंचाई सुनिश्चित होती है, वहीं इस विधि से सिंचाई करने से पौधों की पत्तियों पर जमें धूल के कड भी घुल जाते हैं जिससे पौधोेें की वात्पोसर्जन तथा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बढ जाती है तथा उत्पादन में वृद्वि होती है इस विधि से सिंचाई हेतु नाली बनाने एवं उसके रख-रखाव का खर्च बच जाता है तथा नियंत्रित मात्रा में सिंचाई की जा सकती है। इस विधि से उर्वरक एवं कीटनाशक रसायनों का छिडकाव भी क्षमता पूर्वक किया जा सकता है। फसल को पाला एवं तापक्रम से बचाने के लिए यह विधि उपयोगी है स्ंिप्रकलर सेट दो प्रकार के होते हैैं। प्रथम प्रकार के स्प्रिंकलर सेट रिवालल्विंग हेड के होते है, जिसमें दबाव 2 कि0 ग्रा0 प्रति वर्ग से0 मी0 होता है। दूसरे प्रकार के स्प्रिंकलर सेट में परफोरटेड पाइप (छिद्रदार पाइप) होते है, जिनको चलाने के लिए 1.4 कि0 ग्रा0 न्यूनतम दबाव की आवश्यकता होती है।


बौछारी सिंचाई के लाभ:


ऽ          इस विधि से सिंचाई की नालियों एवं मेंडा़ें के बनाने एवं उनके रख-रखाव कह आवश्यकता नहीं पड़ी।


ऽ          जिससे कृषि योग्य भूमि, श्रम एवं लागत की बचत होती है।


ऽ          नालियों से जल प्रवाह के समय होने वाले पानी की क्षति नहीं होने पाती।


ऽ          पानी के नियंत्रित प्रयोग के कारण सिंचाई दक्षता में वृद्धि होती है।


ऽ          इस विधि से सिंचाई में जल स्रोत से अधिक ऊंचाई वाले स्थानों की सिंचाई की जा सकती है।


ऽ          कम सिंचाई जल से अधिक सिंचाई की जा सकती है।


ड्रिप सिंचाई विधि


   इस विधि के अन्र्तगत स्रोत से नियंत्रित जल प्रवाह पाइप द्वारा प्रवाहित किया जाता है। इस पाइप में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिनके द्वारा बूंद-बूंद कर पानी की जड़ के पास टपकता रहता है। इस विधि का प्रयोग साग-सब्जियों, फूलों, फलदार, पेडो़ की सिंचाई के लिए अधिक उपयोगी होता है। महाराष्ट्र में गन्ने की फसलों में भी सफलतापूर्वक यह विधि अपनाई जाती है। इस विधि से नियंत्रित मात्रा में पानी, उवर्रक


एवं कीटनाशी रसायन प्रभावी ढंग से प्रयोग किये जा सकते हैं। इस विधि से सिंचाई करने पर खरपतवार एवं रोंगों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इससे जहां एक ओर श्रमिकों पर व्यय में भारी बचत होती है, वहीं पर कम जल में अधिक सिंचाई की जा सकती है।


सिंचाई की विधियों का चुनाव करते समय


ध्यान देने योग्य बातें:


ऽ          सिंचाई जन से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त हो सके।


ऽ          सिंचाई जल का वितरण एक समान सम्पूर्ण क्षेत्र में हो सके।


ऽ          भूमि की ऊपरी सतह से हानिकारक लवण सिंचाई द्वारा निचली सतह में चलें जाएं जिससे पौधों पर हानिकारक प्रभाव को कम किया जा सके।


ऽ          सिंचाई की चुनी गयी विधि में से भू-परिष्करण सम्बन्धी क्रियाओं में कोई व्यवधान न हो तथा खरपतवारों का नियंत्रण भी आसानी हो सके।


ऽ          सिंचाई के लिए विन्यास तैयार करते समय कम से कम भूमि नष्ट हो।


ऽ          सिंचाई में प्रयुक्त पानी का कम से कम नुकसान हो और आसानी से जड़ क्षेत्र में पहुँच जाए।


ऽ          अत्यधिक मूल्यवान उपकरणों की आवश्यकता न हो।


ऽ          चुनी गयी विधि से अन्य कृषि क्रियाओं में कोई विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिए।


अधिक उत्पादन हेतु लाइनों में बुआई करें।