ढ़ाई आखर की पाति


ढ़ाई आखर की पाति



सोचती हूँ, लिख भेजूं पाति तुम्हें,
वो ढ़ाई आखर वाली।
जिसमें छिपा है, सम्पूर्ण जीवन का सार।
समय की हकीकत से परे,
सुन्दर स्वप्नों का संसार।
लिख भेजूं तुम्हें।
अपने भी कहीं छूट गये।
यूं ही तो बरसों बीत गये
जाने, अन्जाने,
कितने ही सावन, कितने ही पतझड़।
लिख भेजूं तुम्हें।
बिखरे हैं रंग जीवन में,
या बेरंग है पन्ने,
लिख भेजूं तुम्हें।
सब आज, अभी, हां अभी,
ढ़ाई आखर की पाति में।



ये कविता काॅपीराइट के अंतर्गत आती है। कृपया प्रकाशन से पूर्व लेखिका की संस्तुति अनिवार्य है।