महिला पंच

महिला पंच


मुन्नी भट्ट


मैं कोट्यूड़ा गाँव की पंच हूँ। महिला संगठन की सदस्या भी हूँ। मैं ग्राम सभा की गोष्ठियों में भाग लेने के लिए जाती हूँ। संस्था द्वारा गाँव और क्षेत्र में आयोजित की जाने वाली बैठकों और सम्मेलनों में भाग लेती हूँ। उत्तराखण्ड महिला परिषद्, अल्मोड़ा द्वारा आयोजित की गई गोष्ठियों में भी हिस्सेदारी करती हूँ। गाँव में मासिक गोष्ठी होती है। उसमें संस्था से आई हुई दीदी कहती हैं , कि महिलायें अपने अधिकारों के लिए, हक के लिये आवाज उठायें । समाज में खुलकर अपनी बातें कहें। पहले हम गोष्ठियों में जाते थे ,तो चुप रहते थे।  लेकिन संस्था में जुड़ने के बाद परिवर्तन आया है। जब भी ग्राम सभा की खुली बैठक होती है, सभी ग्रामवासी वहाँ जाते हैं। मैं ब्लॉक की बैठक में अपने वार्ड की समस्याएं कहती हूँ , ताकि उनका समाधान हो और ग्रामवासियों को सुविधाएं मिलें।


एक बार कुछ स्त्रियाँ ग्राम सभा की खुली बैठक में भाग ले रही थीं। गोष्ठी में पुरूष ज्यादा बोल रहे थे। महिलाओं ने कहा कि पुरूषों की संख्या ज्यादा है, महिलायें कम हैं। फिर भी, उन्हें बोलने का मौका नहीं मिल रहा है। यह सुनकर ग्राम विकास अधिकारी ने कहा कि महिलायें अपनी समस्याएं कहें। महिलाओं ने रास्ता बनाने हेतु प्रस्ताव लिखा। फिर मैंने अपने गाँव में सी.सी. मार्ग बनवाया। गाँव की महिलाओं को काम पर रखा। महिलाओं ने पत्थर ढोये, पुरूषों ने रास्ता बनाया। ग्राम प्रधान के साथ विकासखण्ड की गोष्ठी में भी गई। वहाँ सरकारी योजनाओं की जानकारी हुई। संस्था के माध्यम से आवेदन पत्र लिखना सीखा । कुछ महिलाओं को पेंशन का फार्म भरना सिखाया। 


जब गाँव में क्षेत्र पंचायत सदस्य आये,  तो हमने धर्मशाला बनाने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार करके काम शुरू करने की अनुमति दी। महिलाओं ने संगठन के माध्यम से काम किया। मंदिर में सभी ग्रामवासियों ने एक दिन श्रमदान भी किया।


हमें उत्तराखण्ड महिला परिषद् की गोष्ठियों में पंचायत-सम्बन्धी अनेक जानकारियाँ दी जाती हैं। अल्मोड़ा में आयोजित गोष्ठियों में कुमाऊँ, गढ़वाल क्षेत्रों की महिला पंच एवं प्रधान आती हैं। वे अपने-अपने कार्यों के अनुभव बताती हैं। इन अनुभवों से हमें काफी हिम्मत मिलती है। योजनाओं की जानकारी होती है। विकासखण्डों की योजनाएं गाँव में कैसे चलती हैं, यह पता चलता है। हम लोग भी अपने अनुभव उन्हें बताते हैं। सभी के अनुभवों का आदान-प्रदान होता है गोष्ठी में आई हुई सभी महिलाओ की जानकारियाँ बढ़ती हैं।


इस वर्ष 2014 में भी ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव होने हैं। महिलाओं ने अपने संगठन से किसी अच्छे व्यक्ति या महिला को सहयोग देना है ताकि वह आने वाले पाँच सालों में गाँवों का विकास कर सके। इस बीच लगातार तीन माह से हमारे गाँव-क्षेत्र में पंचायत चुनाव सम्बन्धी चर्चाएं हो रही हैं। संगठनों की मासिक गोष्ठियों में भी यही चर्चा हो रही है। संस्था की कार्यकर्ताओं ने हमें महिला परिषद्, अल्मोड़ा, द्वारा तैयार किये गए पोस्टर दिखाकर समझाया कि महिलायें घर व बाहर के सभी काम कर सकती हैं तो पंचायतों में क्यों नहीं जा सकती? महिलायें सामान्य एवं आरक्षित दोनों सीटों से चुनाव लड़ सकती हैं। पहले तो गाँव में महिलाओं को भ्रमित कर देते थेसामान्य-सीट को पुरूष-सीट कह कर चुनाव लड़ते थे लेकिन अब महिलाओं की जानकारी बढ़ी है।  वे चुनाव में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगी हैं।