मोबाइल और वीडियो कांफ्रेंसिंग से होगी केसों की सुनवाई

||मोबाइल और वीडियो कांफ्रेंसिंग से होगी सुनवाई||



सूचना आयुक्त जेपी ममगाई ने कहा कि सीमांत इलाकों में केसों की सुनवाई की व्यवस्था.


पिथौरागढ़ और चमोली जिलों में होगी मोबाइल सुनवाई की व्यवस्था.



सूचना आयुक्त जेपी ममगाई पूर्व आईआरएस हैं। वह पहाड़ के प्रति समर्पित रहे हैं. इसलिए उनका अधिकांश समय यहां की समस्याओं के निपटाने और विकास को लेकर बीता है। सेवानिवृत्ति के बाद वो आज सूचना आयुक्त की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनका कहना है कि सीमांत पर्वतीय इलाकों में सूचना के अधिकार को लेकर धीरे-धीरे चेतना आ रही है। सीमांत गांवों तक सूचना का अधिकार पहुंचे इसके लिए मोबाइल कोट और कलेक्ट्रेट स्तर पर वीडियो कांफ्रेंसिंग से केसों की सुनवाई की व्यवस्था की जा रही है ताकि सीमांत इलाके के लोगों को भी सूचना के अधिकार का लाभ मिल सके।


पर्वतीय इलाकों में जागरूकता का सवाल


सूचना आयुक्त ममगाईं के अनुसार प्रदेश के मैदानी इलाकों में सूचना का अधिकार को लेकर जागरूकता है और लोग इस मामले को गंभीरता से भी लेते हैं। सूचना न मिलने पर द्वितीय अपील भी की जाती है लेकिन सीमांत इलाकों में यदि पीआईओ या लोक सूचना अधिकारी तय समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराता है तो लोग द्वितीय अपनी करने में रुचि कम ही लेते हैं क्योंकि द्वितीय अपनी के लिए उन्हें दूर जिला मुख्यालय तक जाना होता है। ऐसे में हमारा प्रयास है कि मोबाइल कोर्ट या कलेक्ट्रेट से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए केसों की सुनवाई करने की व्यवस्था करेंगे। चमोली और पिथारागढ़ जस सीमांत जिलों में इसकी सनवाई की व्यवस्था करने की योजना है।


नैनीताल, पौडी और अल्मोड़ा में लोग जागरूक


में लोग जागरूक सूचना आयुक्त जेपी ममगाई का कहना है कि सूचना का अधिकार के बारे में तीन पर्वतीय जिलों में काफी जागरूकता है। इन जिलों में पौड़ी, अल्मोड़ा और नैनीताल जिले शामिल हैं। रुद्रप्रयाग और चम्पावत में अभी सूचना का अधिकार को लेकर अधिक चेतना नही हैं। सूचना के लिए पहली अपील लोक सूचना अधिकारी से मांगी जाती है यदि सूचना से अपीलकर्ता संतुष्ट हो जाता है तो वह द्वितीय अपील नहीं करता है, लेकिन यदि संतुष्ट नहीं होता है तो वह द्वितीय अपील कर सकता हैउनका मानना है कि अब पर्वतीय इलाकों में भी सूचना का अधिकार को लेकर जागरूकता बढ़ रही है।


क्या आरटीआई ब्लैकमेलिंग का हथियार है?


का हथियार है? इस सवाल के जवाब में उनका कहना है कि यह सही नहीं है। अधिकांश लोग परेशान होने के बाद ही द्वितीय अपील के लिए आते हैं। सूचना का अधिकार ब्लैकमेलिंग का हथियार नहीं है। चंद लोग यदि इस तरह की भावना को लेकर अदालत में आते हैं तो हम उनका इरादा भाप लेते हैंसूचना का अधिकार लेने का कारण कोई नहीं पूछता है। अधिनियम में स्पष्ट है कि क्या सूचना देनी है और कितनी देनी है। यदि कोई अधिकारी जानबूझकर सूचना दन म विलम्ब करता है या आदेश की अवहेलना करता है तो उसके लिए भी दंडका प्रावधान है।


अधिनियम अपनी भूमिका के माध्यम से यह चाहता है 


• नागरिक सूचना प्राप्त कर, प्राप्त की हुई जानकारी को समय तथा उसका उपयोग लोक प्राधिकारी की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने तथा लोक प्राधिकारी का उत्तरदायित्व बढ़ाने के लिए करें।


• प्राप्त की हुई सूचना का उपयोग नागरिक सरकार की कार्यप्रणाली को विकसित करने में और भ्रष्टाचार रोकने में करें ताकि सरकार तथा उसके अधीन कार्यरत परिकरणों को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया जा सके।


क्या है सूचना का अधिकार अधिनियम 2005


प्रत्येक लोक प्राधिकारी के कार्यकरण में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के संवर्द्धन के लिए लोक प्राधिकारियों के नियंत्राणाधीन सूचना तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए नागरिकों के सूचना के अधिकार की व्यवहारिक शासन पद्विति स्थापित करने, एक केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग का गठन करने और उनसे संबंधित या उनसे आनुशांगिक विषयों का उपबंध करने के लिए अधिनियम - भारत के संविधान ने लोकत्रांतिक गणराज्य की स्थापना की है। वास्तविक व्यवहार में सूचना के प्रकटन से संभवत अन्य लोकहितों जिनके अंर्तगत सरकारों के दक्ष प्रचलन, सीमित राज्य वित्तीय संसाधनों के अधिकतम उपयोग और संवेदनशील सुचना की गोपनीयता को भी बनाए रखना है, के साथ विरोध हो सकता है। अतः अब यह समाचीन है कि ऐसे नागरिकों को, कतिपय सूचना देने के लिए, जो उसे पाने के इच्छुक हैं, उपबंध किया जाए।


भारत गणराज्य के 56वें वर्ष में संसद द्वारा निम्न लिखित रूप से अधिनियम हो। यह आधारभूत सिद्धांत है कि जब कभी भी विधान की भाषा स्पष्ट नहो, विधान की भूमिका से उसे स्पष्ट करने के लिए सहारा लिया जाना चाहिए। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की भूमिका को सरल शब्दों में समझने का प्रयत्न करें तो यह बताता है कि यह अधिनियम एक ऐसे व्यवहारिक शासन पद्धति स्थापित करने के लिए लाया गया है जिसके माध्यम से नागरिकों द्वारा सूचना का अधिकार के माध्यम से लोक प्राधिकारियों के नियंत्रण में रखी सूचना पाना सुनिश्चित किया जा सके, जिससे कि प्रत्येक लोक प्राधिकारी की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व को बढ़ावा दिया जा सके। केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग तथा उससे संबंधित या जुड़े विषयों सहित आयोग का गठन किया जा सके।