अहा! भोले भारतीय!

वियतनाम-5




अहा! भोले भारतीय!


सामान्य तौर पर कहा जाता है कि भारतीय लोग बाहर जाकर बड़े ही अनुशासित, व्यवहार में आदर्श और सेवाभावी हो जाते है, पर मेरा अनुभव यह कहता है कि हम भारतीयों के चतुर-चालक होने का मुकाबला शायद ही कोई दूसरे देश वाला पाए। हालांकि, अपवाद हर जगह हो सकते हैं। दो छोटी घटनाओं का जिक्र जरूरी है जो वियतनाम यात्रा से जुड़ी हैं।


वियतनाम में पिछले कुछ वर्षों में जितने भारतीय युवा गए हैं, उनमें से ज्यादातर योग के शिक्षक हैं। हम लोग डंका पीटते हैं कि भारत के बिना दुनिया में योग जीवित नहीं रह पाएगा, लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि वियतनाम में जो बड़ी कंपनियां लोगों तक योग पहुंचा रही हैं, उनमें से ज्यादातर यूरोप और अमेरिका की हैं। इन्हीं कंपनियों ने भारतीय युवाओं को अपने यहां योगाचार्य के रूप में नियुक्त किया हुआ। मेरा एक छात्र पुनीत कुछ महीने पहले तक हो ची मिन्ह सिटी में एक अमेरिकन कंपनी में योगाचार्य था और अब वह दूसरी कंपनी में हनोई सिटी में आ गया है। उसने बताया कि उसकी कंपनी में भारत के 100 से ज्यादा युवा योग शिक्षक के रूप में काम कर रहे थे और ज्यादातर का वेतन एक से डेढ़ लाख प्रतिमाह के आसपास था।


जिस व्यक्ति के माध्यम से इन्हें नौकरी मिली, उसे किसी कारण से कंपनी से निकाल दिया गया। उस के स्थान पर जिस दूसरे भारतीय व्यक्ति को पद पर रखा गया, उसने कंपनी में अपनी हैसियत बढाने के लिए ऐसा कारनामा किया, जो वहां रह रहे भारतीय युवाओं के लिए एक बड़ी परेशानी का कारण बन गया। उन सज्जन ने कंपनी प्रबंधन को यह समझा दिया कि भारतीय युवाओं को इतना ज्यादा वेतन देने की जरूरत नहीं है, योगाचार्य 50-60 हजार के वेतन पर भी मिल जाएंगे। इसके बाद छटनी हुई और जिन नए युवकों को नौकरी मिली, वे डेढ़ लाख की बजाए 50-60 हजार प्रतिमाह पर रखे गए। इसका परिणाम यह हुआ कि अन्य कंपनियों ने भी या तो छंटनी शुरू कर दी या वेतन घटा दिया। इस सारे मामले के पीछे ना कोई विदेशी हाथ है और ना ही कोई विदेशी षड्यंत्र। ये हमारे ही लोगों का किया-धरा है। अब योग शिक्षक के रूप में वियतनाम जा रहे युवाओं में से शायद ही किसी को अच्छा वेतन मिल पा रहा है।


यह अलग बात है, वियतनाम सस्ता और गरीब देश होने की वजह से वहां कम खर्च में काम चल जाता है। 50-60 हजार की नौकरी के बावजूद थोड़े-बहुत पैसे बचाकर भेजने की स्थिति बनी रहती है। इससे पहले ऐसी घटनाएं चीन में भी हो चुकी हैं। इसके बाद चीन सरकार ने योग प्रशिक्षकों की नियुक्ति और भर्ती के लिए काफी सख्त नियम बना दिए हैं और अब वहां केवल वही व्यक्ति योग शिक्षक के रूप में जा सकते हैं जिन्होंने योग में मास्टर डिग्री प्राप्त की हो, जबकि इससे पहले योग के स्नातक और योग में पीजी डिप्लोमा योग्यता वाले युवाओं को भी चीन में काम मिलता रहा है। वैसे तो चीन अब अपने योग शिक्षक तैयार कर रहा है। यह भी पता लगा कि जो स्थिति वियतनाम में पैदा हुई है, कमोबेश वैसी स्थिति लाओस, थाईलैंड और कंबोडिया में भी बन गई है।


एक और घटना है, जो सीधे तौर पर तो ऊपर वाली बात से नहीं जुड़ी है, लेकिन वह कहीं न कहीं हमारे चरित्र की तरफ इशारा जरूर करती है। ये घटना नमस्ते हनोई रेस्टोरेंट के संचालक के साथ जुड़ी है। हमारे टूर के दौरान एक दिन का भोजन इस रेस्टोरेंट में रखा गया था। टूर पैकेज के हिसाब से भोजन की कीमत लगभग 400 रही होगी। हम लोग आकर बैठे ही थे, तभी रेस्टोरेंट का संचालक आ धमका। उन्होंने अपने रेस्टोरेंट की तारीफ की, वहां के खाने के बारे में बड़े-बड़े दावे किये। वहां काफी भीड़ थी, इससे लग रहा था कि अच्छी जगह है। उन्होंने कहा कि आप हमारे रेस्टोरेंट की बनी हुई डीप फ्राइड भिंडी जरूर चखियेगा। इसके बाद उन्होंने एक और डिश के बारे में बताया, कुछ देर बाद उन्होंने वो भी भिजवा दी। उन्होंने बताया कि वह इससे पहले कनाडा में रेस्टोरेंट चलाते थे और खानपान की दुनिया में उनका नाम का काफी प्रतिष्ठित है। वे बीच-बीच में आकर बात करते रहे और अपने किसी न किसी खाने की खूबी का जिक्र करने में लगे रहे।


कुल मिलाकर किस्सा ये कि जब हम लोगों ने रेस्टोरेंट छोड़ा तो करीब 5 हजार का बिल थमा दिया। अब हम सभी के भौचक्का होने की बारी थी क्योंकि इससे पहले दिन जिस रेस्टोरेंट में खाना खाया था, वहां सभी कुछ हमारे पैकेज में शामिल था, लेकिन इस आदमी ने पानी से लेकर सलाद तक और जो चीजें उन्होंने खुद आग्रह करके भेजी, उन सब की कीमत जोड़कर बिल पकड़ा गया था। निश्चित रूप से उनका यह व्यवहार परेशान करने वाला था, क्योंकि खाने वाले मानकर चल रहे थे कि यह सब कुछ उनके मेजबान की तरफ से है और उनके पैकेज का हिस्सा है, लेकिन मेजबान अपने चालाकी भरे व्यवहार से ग्राहकों को ठग रहा था। जब सब लोगों ने उसे मिलकर खरी-खोटी सुनाई तो उसने मुश्किल से पानी और सलाद का बिल घटाया। और ऐसा नहीं है कि ऐसी घटना केवल हम लोगों के साथ ही हुई होगी।


पहले भी जो लोग इस रेस्टोरेंट में जाते रहे होंगे, उन सभी के साथ कमोबेश यह होता रहा होगा क्योंकि वह सज्जन केवल हमारी टेबल पर ही नहीं, बल्कि दूसरी टेबलों पर भी इसी तरह से लोगों को अपने यहां के खाने की खूबी के बारे में बता रहे थे और फिर उनके लिए वो खाना मंगवा रहे थे। अब इसका एक नुकसान तो यह हुआ कि हमने उन सज्जन के मंगवाए हुए खाने से ही पेट भर लिया इसलिए जो खाना हमारे पैकेज में था, उसको मंगवाने की जरूरत ही नहीं पड़ी तो पैकेज वाला खाना होटल को बच गया और होटल के संचालक ने अपनी पसंद का खाना ग्राहकों की जेब पर चेप दिया। यह बात कुछ हजार रुपये की नहीं है, बल्कि बात उस व्यवहार की है जो चालाकी भरा है ।


इससे पहले हम लोग टेस्ट ऑफ इंडिया रेस्टोरेंट में गए थे, जिसका संचालक श्रीलंका से था, उसने एक भी चीज न जबरन थोपी और ना ही छिपे हुए ढंग से हमारे बिल में शामिल करने की कोशिश की। वहां सलाद और स्नैक्स इतनी मात्रा में परोसे गए कि इन्हें खाने के बाद लगा, जैसे भोजन की जरूरत ही नहीं रहेगी।


इस यात्रा में अच्छे-बुरे सभी अनुभव थे, लेकिन भारतीयों वाले अनुभव ज्यादा चुभे। मनुष्य का मस्तिष्क बुरी चीजों को लंबे वक्त तक याद रखता है और सामान्य तौर पर अच्छी चीजों को जल्दी भूल जाता है। इन दोनों घटनाओं के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि विदेश में रह रहे भारतीय काफी चतुर होते हैं और वहां घूमने जाने वाले हम जैसे लोग उनका आसान शिकार बन जाते हैं।