प्रतिबद्धता की मिशाल है डा॰ बचन


||प्रतिबद्धता की मिशाल है डा॰ बचन||


इन्सान सपने देखता है, सपने बुनता है, साकार करने के लिए जीभर मेहनत करता है। मगर ये सपने कब पूरा हों, यह उसके बस से बाहर ही रहे है। बहरहाल हर इन्सान की यही फितरत ताउम्र रहती है। सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के पलेठा गांव में जन्में डा॰ बचन लाल ने ऐसा ही सपना बुनने का एक फैसला लिया। उसे क्या मालूम था कि सपनों को पूरा करने में कोई लम्बा सफर तय करना पड़े, या सपना सपना ही रह जाये अथवा सपना पूरा हो जाये।


किशोर अवस्था से ही उसके सामने यह तय हो गया था कि आगे बढने के लिए उसे संसाधन जोड़ने पड़ेंगे। रास्ता तय करना होगा। स्वयं रास्ता ढूंढना, स्वयं तैयारी करना, कोई रास्ते को दिशा देने वाला नहीं। वह तो कभी पत्थर तोड़कर, कभी नदी में मछली मारकर या कभी दूसरी दियाड़ी मजदूरी करके खुद को संबल बनाने की जुगत करता रहा। साथ ही वे समर्थ लोग कभी-कभी हंसी ठिठोली भी कर लेते थे, कि फलां क्या सपना देख रहा है? मगर उसने इसे समय की नजाकत माना और अपने दृढ निश्चय पर अडिग रहा। यह बात इसीलिए लिखी जा रही है कि उसने जब अपना मुकाम पाया तो उसके लिए यह कुछ दिनों तक सपना ही लग रहा था। क्योंकि जिस समाज से वह आया है वहां से यहां तक तय करना मुश्किल था। सो आज उनके बाद, उस क्षेत्र से और भी उस समाज से इस रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहे। कह सकते हैं कि उस क्षेत्र और समाज से यह पहला व्यक्ति है जिसने हिन्दी साहित्य में डाॅक्टरेट की उपाधी प्राप्त की है।


हम बात कर रहे हैं डा॰ बचन लाल जी की। वे मौजूदा समय सोबन सिंह जीना कुमाऊ विश्वविद्यालय अल्मोड़ा परिसर के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रो॰ के पद पर कार्यरत हैं। हाल ही में उनके निर्देशन में आधा दर्जन विद्यार्थी हिन्दी साहित्य में अलग-अलग विषयों पर शोधरत हैं। श्री लाल की संघर्ष गाथा बहुत ही दुरूह और बीहड़ रही है। वे कक्षा दस पास करने के बाद जिम्मेदारी संभालने लग गये थे।


उच्च शिक्षा के लिए जब वे उत्तरकाशी पंहुचे तो उन्हे पारिवारिक संकटो ने बुरी तरह से घेर लिया था। ऐसे वक्त या तो वे अपना शोध कार्य छोड़ देते या संकट का डटकर मुकाबला करे। दोराहे पर खड़ा डा॰ बचन लाल एक बारगी अपने को ही कोसता रहा। एक तरफ पारिवारिक संकट और दूसरी तरफ शोध कार्य व पठन-पाठन, परिवार के लिए संसाधन जोड़ना, उनकी नियति बन गई। वे सभी संकटो का सामना एक युद्ध की तरह करने लगे। उन्होंने संसाधनो को एकत्रित करने के लिए दियाड़ी-मजदूरी से लेकर, मछली बेचना, घर-घर लोक जागर के कार्यक्रम आयोजित करना जैसे सूक्ष्म कार्य उनको थोड़ी-थोड़ी आर्थिकी से उनका हौंसला बढाने लगे। अर्थात इस हालात में उनके साथ थी, तो उनकी सकारात्मक दृष्टी। इसी दृष्टी के बलबूते वे आज अपने मुकाम पर है। तात्पर्य यह है कि ऐसे समुदाय में वे जन्मे, जहां आज अक्षर ज्ञान तो है, मगर रास्ते तय करना उनके लिए सच में सपने जैसे ही लगते हैं।


जितनी कठीनभरी जिन्दगी उनकी रही, उतना ही संघर्षमयी उनका शोध कार्य का विषय भी रहा है। हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार रमाप्रसाद घिल्डियाल ‘पहाड़ी’ के कथा साहित्य पर ‘जीवन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में रमाप्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी की कहानियों का अनुशीलन’ शीषर्क पर हे॰न॰ बहुगुणा केन्द्रीय गढवाल विश्वविद्यालय श्रीनगर से पूरा करते हुए उन्होंने 2004 में डाक्टरेट की उपाधी प्राप्त की है। पर वे कहां रूकने वाले में से है। इसके बाद तो उनके कई लघुशोध पत्र देशभर के प्रसिद्ध जर्नलो में प्रकाशित हुऐ है। जैसे गढवाल के लोक गीतो में नारी, समाचार पत्रों में हिन्दी वर्तनी, पत्रकारिता एवं सामाजिक सरोकार, रवांई के लोक गीतो में नारी, ईलाचन्द जोशी के कथा साहित्य पर एक दृष्टी, यमुनाघाटी-रवांई की सांस्कृतिक विरासत मेले, लोक गाथा दशा और दिशा, विषयो पर दर्जनो शोध पत्र नामचीन जर्नलो में प्रकाशित हुए है। जबकि वे लगातार देशभर के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारो में विषय विशेषज्ञ के रूप में व्याख्यान देते आये है। 


कुलमिलाकर रवांई घाटी के डा॰ बचन लाल ऐसे शोधार्थी रहे है, जिन्होंने अपनी थाती को संजोने का काम अब तक नहीं छोड़ा है। वे रवांई घाटी ही नहीं सम्पूर्ण राज्य में आज भी जागर विद्या के मर्मज्ञ माने जाते है। वे जागर विद्या के प्रबल समर्थक है। असीलिए वे सालभर तक गांव-गांव और घर-घर में आयोजित होने वाले लोक जागरो में विधिवत हिस्सा लेते है। उन्होंने ही लोक जागरो के मौखिक श्लको को लिपिबद्ध किया है। वे उत्तराखण्ड के लोक जागरो को भागवत पुराण का लघु रूप बताते हैं। 


एक तरफ वे हिन्दी के प्रध्यापक हैं और दूसरी तरफ वे लोक जागरो के प्रस्तोता है। अतएव वे दो तरह से शिक्षक के रूप में शब्द साहित्य को अध्ययन का हिस्सा बना रहे हैं। कह सकते हैं कि सपने साकार होते देखना ही ऐसे मनिषियों के हिस्से जाता है। अर्थात वे अपने नाम के मुताबिक भी खरे उतरे है। वे बचन है। बचन यानि प्रतिबद्धता या प्रण! बस इसी प्रण ने उन्हे संघर्षो के थपेड़ो से निकालकर अध्यापन की जिम्मेदारी तक पंहुचाया है।