सोशल मीडिया और साहित्य का शीत युद्ध


||सोशल मीडिया और साहित्य का शीत युद्ध||



 

आजकल बहुत सारे युवा साथी साहित्य लिखने में रुचि ले रहे हैं।विशेषकर कविता की ओर रुझान ज्यादा दिख रहा है।और वह इनबॉक्स में आकर कमेंट करने को कहते हैं या इच्छा रखते हैं कि उनको लाइक किया जाए उनके लिखे पर कमेंट किया जाय मित्रो अपनी बात स्पष्ट कर दूं अभी मुझे ही कविता की समझ नहीं है।आपको क्या बता सकता हूँ।हाँ जो कविता अच्छी लगती है उस पर लाइक और कमेंट करता ही हूँ अगर आपकी पोस्ट मुझे दिखती है तो।इसलिए आप अपनी वाल पर खूब कविताएं पोस्ट करें ।

 

एक निवेदन है मुझे टैग न करें वैसे आप करेंगे भी तो वह मेरी वाल पर दिखेगी नहीं।यह सेटिंग ऐसी इसलिए बना रखी है कि।न आपकी पोस्ट से मुझे परेशानी हो न मेरे मित्रों को।तो दोस्तो लिखने वालों को पहले खूब साहित्य पढ़ना चाहिए।आप पढ़ेंगे तो आपकी एक दृष्टि विकसित होगी।और आप लिखने के औचित्य को समझने में सक्षम भी होंगे।आपका लिखा सार्थक भी होगा।आप अपने महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जिनके कसीदे पढ़ रहे होते हैं।कविता में उन्ही लोगों को कोस रहे होते हैं।आपका साहित्य मजबूत होगा कैसे।

 

आप सोशल मीडिया में हैं तो सही वहाँ केवल अपना प्रचार कर रहे हैं।सामाजिक मुद्दों पर,शिक्षा पर,साहित्य पर बोलने से इसलिए बचते हैं कि आप कहीं किसी के नजर में चढ़ न जाएं या कि आप पुरुस्कार की होड़ से बाहर न हो जाएं।यह आपके लिखे को कमजोर ही नहीं आडम्बर पूर्ण लफ्फाजी ही कहा जा सकता है।यह सत्य है कि आपकी रचना योग्य होगी तो उसके लिए किसी के इनबॉक्स में हाथ जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी की लाइक कर दो कमेंट कर दो।वह स्वतः ही आपको मिलेगा।यह भी सत्य है कि ज्यादा कमेंट और लाइक रचना के अच्छे होने का परिचायक नहीं होता।फेसबुक और ट्विटर का एक ट्रेंड है ।आपकी किसी के लिखे पर आलोचनात्मक तो लिखना ही नहीं है।

 

अगर लिख भी दिया तो सामने वाला नाराज ।यह कब होता है जब आप अपने लिखे पर हद से ज्यादा ओवर कॉन्फिडेंस होते हैं।इसी लिए आपने ध्यान दिया होगा प्रतिष्ठित लेखको का एक अलग तरीका होता है किसी की भी कविता को लाइक करने का और कमेंट करने का । वहाँ भी गड़बड़ झाला तो है।किसको गिराना है किसको चढ़ाना है।यह कुछ कुछ राजनीति सा है।विश्विद्यालय सा है।और भाई भाई की लड़ाई सा कुछ है।कुछ लोग इससे मना कर सकते हैं पर ऐसा है।इसलिए आप अपनी वाल पर खूब लिखें अपने मन की बात और भड़ास ,दूसरे को आखिर टैग क्यों करना है।हाँ आपने कुछ नया पढा है उस पर लिखने की कोशिश करें।यह आपको साहित्य को समझने में मदद करेगा ।मैं क्यों लिखता हूँ जैसे निबंधों को बार बार पढ़ें।साहित्य में अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश करें।सच मानिए आप खुद में बदलाव पाएंगे ।यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है।शुरू शुरू में लिखना और छपना एक नसा होता है।आप अपने लिखे पर खुद मन्त्र मुग्ध हैं।तो समझलो अभी आप साहित्य से बहुत दूर हैं।आपको बहुत ज्यादा पढ़ने और मनन करने की जरूरत है।

 

साहित्य में एक जुगाड़ तबका भी है।जिसका काम आपको प्रायोजित कर मंच देना पुरुस्कार देना है।ऐसे बहुत सारे पत्र डाक द्वारा प्राप्त होते रहते हैं।मानद डॉक्टर की उपाधि ,अमुक सम्मान आदि इनसे सावधान रहें।यह आपको कमजोर ही नहीं अति महत्वाकांक्षी भी बनाते हैं।मंचों पर माइक का स्वाद भी एक नशा ही है।यह सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है इससे वही अछूता रह पाता है जो खुद को कंट्रोल कर पाता है।यह सब सोचना और करना बहुत त्याग का विषय है।

 

इतना सोच पाना और उस पर अमल करने के लिए स्पष्ट विचार और विजन का होना आवश्यक है।इसलिए पूर्व लिखे को पढ़ना और उसकी समीक्षात्मक मन से मनन करना बहुत जरूरी होता है।यह मेरा व्यक्तिगत मानना है।