|| मीठे बोल ||


|| मीठे बोल ||


जीवन है चार दिनों का मेला, आना और जाना रीत यही।
दो मीठे बोल जुबां से बोलो, है प्रेम यही है प्रीत यही।।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा, ये सब दुनिया की उलझन है।
बेमतलब की इन बातों में ही, बीत रहा ये जीवन है।
कुछ साथ ना जायेगा अपने, छूटेगा वो मनमीत यहीं।
दो मीठे बोल जुबां से बोलो, है प्रेम यही है प्रीत यही।।
क्यों करते हो चुगली निन्दा, क्यों बैर दिलों में बोते हो।
नफरत की गठरी पास में है, गंगा में पाप को धोते हो।
जब अंत समय आयेगा, रह जायेगी हार और जीत यहीं।
दो मीठे बोल जुबां से बोलो, है प्रेम यही है प्रीत यही।।
कटु वचनों के परिणाम हुआ, महाभारत का विराट यु़द्ध।
मृदु वचनों से दस्यू हारा, गौतम ने हृदय किया था शुद्ध।
वेद, पुराण ये बतलाते, कहते हैं राम और कृष्ण यही।
दो मीठे बोल जुबां से बोलो, है प्रेम यही है प्रीत यही।।


नोट- यह कविता सर्वाधिकार सुरक्षित है, कृपया प्रकाशन से पूर्व लेखिका की संस्तुति अनिवार्य है।