औषधीय खेती - 11- हजारा (गेंदा)

(द्वारा -  वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा
किताब - जलग्रहण विकास-क्रियान्यवन चरण, अध्याय - 11)
सहयोग और स्रोत - इण्डिया वाटर पोटर्ल-


||हजारा (गेंदा) वानस्पतिक नाम (Tagetus)||


मौसमी फूलों में गेंदे का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके फूल विभिन्न रंगों व आकारों में आते है तथा साल भर तक मिलते रहते हैं। इसकी खेती अधिकतर खुले पुष्पों के लिए की जाती है जिनकी माला, गजरा, वेणी, गुलदस्ता व अन्य सजावटी कार्यो के लिए प्रयोग किया जाता है। गेन्दा एक ऐसा पौध है जो आसानी से उगाया जा सकता है और इस पर कीट एवं बीमारियों का प्रकोप बहुत कम होता है। आर्थिक दृष्टि से इसकी खेती करना लाभदायक है।


उन्नत किस्में


बड़े फूलों वाली (अफीकन गेन्दा)


क्राउन आफ गोल्ड (पीला), जूड़न्ट सनसेट (नारंगी), स्पन यलो (पीला), स्पन गोल्ड, यलो फलफी, यलो स्टोन, गोल्डन एज, आरेंन्ज हवाई।


छोटे फूलों वाली (फेच्च गेन्दा)


रेड ब्राकेट बटर स्काच, गोल्डी रस्टी रेड, लेमन जेम, स्कारलेट ग्लो लेमन ड्राप, रेड, चेरी बोनान्जा फ्लेम, यलो बाय, गोल्डन बाय, हनी काम्ब स्कारलेट सोफिया, क्वीन सोफिया।


संकर किस्में


ब्यूटी गोल्ड, ब्यूटी यलो, ओरेन्ज जुबली, गोल्डन जुबली, डायमण्ड जुबली, यलो फस्ट लेडी, प्राइम रोज लेडी, रायल यलो, रीयल ओरेन्ज


भारतीय किस्में


पूसा नारंगी गेंदा व पूसा बसन्ती गेंदा


जलवायु एवं भूमि


गेन्दे को साल भर, तीनों ही ऋतुओं में आसानी से उगाया जा सकता है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए शरद ऋतु उपयुक्त पाई गई है। इसका पौधा पाले से प्रभावित होता है अतः इससे पौधों का बचाव करे।


अच्छे जल निकास वाली रेतीली दोमट भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है। अधिक क्षारीय एवं अप्लीय भूमि इसके पौधों की वृद्धि व पुष्प उत्पादन में बाधक है।


प्रसारण


आम तौर पर गेन्दे को बीज द्वारा ही उगाया जाता है। बीजों को पौधशाला में ऊँची उठी हुई क्यारियों में समान रूप से बिखेर कर बुवाई करे। 3 से 4 सप्ताह बाद पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके हैक्टेयर की बुवाई के लिए लगभग सवा कि.ग्रा बीज की आवश्यकता होती है। इसके बीजों की अंकुरण क्षमता सालभर से अधिक रहती है किन्तु अधिक पुराना बीज नहीं बोना चाहिए क्योंकि इनकी अंकुरण क्षमता घट जाती है।


भूमि की तैयारी


खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से कर, खेत को कुछ समय खुला छोड़ दें ताकि तेज धूप से भूमि में मौजूद हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाये। बाद में देशी हल से जुताई करे एवं खेत को समतल कर ले। आखिरी जुताई के समय 20 से 25 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिला दे तथा सिंचाई की सुविधानुसार क्यारियाँ बना लें। क्यारियां बनाने से पूर्व भूमि में 125-200 किग्रा. यूरिया, 400 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फाॅस्फेट व 100 कि.ग्रा म्यूरेट आफ पोटाश को भूमि में मिला दे। रोपाई के 35 से 40 दिन बाद खड़ी फसल में 125 कि.ग्रा. यूरिया देकर सिंचाई कर देवें।


बुवाई का समय


शीतकालीन फसल लेने के लिए बीज की बुवाई सितम्बर-अक्टूबर में जाती है। ग्रीष्मकालीन फसल के लिए जनवरी-फरवरी में बीज बोना चाहिए तथा वर्षाकालीन फसल लेने के लिये बीज मई-जून में बो देना चाहिए। एक ऋतु में अधिक समय तक फूल लेने के लिए बीज की बुवाई 15 दिन के अन्तर पर की जानी चाहिए।


रोपाई


गेन्दे की रोपाई क्यारियों में करें। अफ्रीकन गेन्दे की रोपाई कतार से कतार 45 से 60 सेन्टीमीटर व पौध 30 से 45 सेन्टीमीटर की दूरी पर करें।


फ्रेन्च गेन्दे की रोपाई पौधे से पौधे व कतार की दूरी 30 सेन्टीमीटर रखते हुए करें। गेन्दे की रोपाई जुलाई में कलम द्वारा भी की जा सकती है। कलम वाले पौधों में 15 दिन जल्दी फूल लिये जा सकते है।


रोपाई संकर गेन्दे के लिए


संकर गेन्दे में रोपाई 60 90 सेमी. दूरी पर करे। इसमें नत्रजन की मात्रा किग्रा. प्रति हैक्टेयर के हिसाब से दी जानी चाहिए।


सिंचाई


गर्मियों में प्रति सप्ताह व सर्दियों में 12 से व 15 दिन के अन्तराल से सिंचाई करे।


देखभाल


गेन्दे की फसल में खरपतवारों को न उगने दे। इस हेतु समय-समय पर निराई-गुड़ाई करे। गुडाई करते समय पौधों के पास मिट्टी चढ़ाये। पौधें, हवा से जमीन पर न गिरे। इसके लिए लकड़ी का सहारा लगाये। जिब्रेलिक ऐसिड 100 से 400 पी.पी.एम. फूलों तथा पौधें की वृद्धि के लिए उपयोगी पाया गया है। इसका उपचार फूल आने से पहले किया जाना चाहिए।


फूलों की तुड़ाई


पौध रोपाई के 60 से 75 दिन बाद फूल तोड़ने लायक हो जाते हैं और औसतन दो-ढाई महिने तक फूल खिलते हैं। अतः पूर्ण विकसित फूलों की नियमित तुड़ाई करते रहना चाहिए। गेन्दे के फूलों की औसतन उपज 80 से 100 क्विंटल प्रति हैक्टेयर मिलती है। अफ्रीकन गेन्दे में सही रखरखाव करने पर 180 से 200 क्विंटल हैक्टेयर उपज मिलती है।