गंगा के उदगम में हरे पेडों पर कुल्हाडी चलाने की तैयारी


||गंगा के उदगम में हरे पेडों पर कुल्हाडी चलाने की तैयारी||


नमामि गंगे के अन्तर्गत गंगा की स्वच्छता और पारिस्थितिकी तन्त्र के सुधार के लिये सरकार ने 30 हजार  हैक्टेयर भूमि पर वनों के  रोपण का लक्ष्य रखा हैं। दूसरी ओर गौर करेंगे तो गंगा के उदगम स्थल में गंगोत्री से हर्षिल के बीच हजारों देवदार के हरे पेडों की हजामत करने के लिये चिन्हित किया गया हैं ।  


यह क्षेत्र अभी तक पिछले दिनों लगी भीषण आग से पूरी तरह भी नहीं उभर पाया हैं। धीरे-धीरे यहाॅ की वनस्पतियाॅ हरीतिमा ओढकर सांस लेने लगी हैं। इसके बाबजूद भी उनके ऊपर आरी -कुल्हाडी का वार करने की तैयारी चल रही है। इसी में फैले 2300 वर्ग किमी क्षेत्र में गंगोत्री नेश्नल पार्क भी हैंै । 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के बाद इसे बढाकर 4 हजार वर्ग किमी तक इको सेंसटिव जोन के रुप में भी सरकार ने घोषित किया हैंै। जिस इको सेंसटिव क्षेत्र में हरित क्षेत्र और कृषि क्षेत्र को बढाने पर सरकार जोर दे रही हैं। वहाॅ किसके इसारे पर वनों की शामत आयी हैं। गंगा को निर्मल और अविरल रखने में वनों की महत्वपूर्ण भागीदारी हैं। इसके बाद भी पेडों के कटान पर रोक नहीं लग पा रही हैं। इस क्षेत्र की शेष बची हुई जैवविविधता के बीच में एक पेड का कटान करना भी अति नुकसान देह होता हैं।


पेडों के कटान और लुढकान से आग और भूस्खलन से प्रभावित यहाॅ की नम धरती में भूमि कटाव की समस्या पैदा होती हैं। भूगर्भविदों ने बाढ और भूस्खलन के लिये अति संवेदनशील जोन 4 और 5 के अन्तर्गत भी यह इलाका रेखॅाकित किया हैं। वैसे भी सन 1977 से 2016 के बीच इस क्षेत्र में 30 बार से अधिक बाढ और हजारों भूकम्प के झटके आ चुके हैं। सन 1991 के भूकम्प का केन्द्र भी इसी क्षेत्र में था। यहाॅ हर  साल जंगलों में आग लगने से असंख्य पेड गिरते रहतेे हैं। जो बाढ के समय भागीरथी नदी में बहकर आते हैं। इन गिरे पडे सूखे पेडों से अपेक्षित लाभ न मिलने के कारण ही हरे पेडों का कटान किया जाता हैं। 
गंगा के उदगम की दुर्लभ वन प्रजातियाॅ जैसे राई, कैल,मुरेंडा, देवदार, खर्सू, मौरू नैर, थुनेर, दालचीनी, बाॅज, बुराॅस आदि शंकुधारी एवं चैडीपत्ती के पेडों के दर्शन पर्यटकों को भी आकर्षित करते है। ये अधिकतर प्रजातियाॅ उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ही पायी जाती हैं।


इनके बीच में उगने वाली जडी- बूटियोॅ और यहाॅ से बहकर आ रही जल धाराये ही गंगा जल की गुणवतापूर्ण निर्मलता वनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। यह ध्यान देने की जरूरत हैं कि यहाॅ की वन प्रजातियाॅ एक तरह से रेन फारेष्ट (वर्षा वाली प्रजाति) के नाम से भी जानी जाती हैं। जहाॅ हर समय वारिष की संभावनायें बनी रहती हैं। यदि यहाॅ ग्लेश्यर भी टूट कर आते हैं तो ये प्रजातियाॅ उसके दुष्परिणाम से भी बचाती हैं। ग्लेश्यरों का तापमान बनाये रखने में भी इनकी सेवा सर्वोपरी हैं। यहाॅ गंगोंत्री के आसपास गौमुख समेत सैकडों ग्लेश्यर हैं जहाॅ हर रोज भरपूर हरियाली की आवश्यकता हैं। यहाॅ जिन देवदार के हरे पेडों को कटान के लिये चिन्हित किया गया हैं, उनकी उम्र न तो छंटाई योग्य हैं, और न ही उनके कोई हिस्से सूखे हैं। 
गौरतलब है कि बाढ, भूस्खलन, भूकम्प के लिये संवेदन शील होने पर भी गंगा के उदगम में देहरादून और हरिद्धार के मानको के बराबर ही मार्ग को चैडा करने की सरकार की योजना हैं।


यह गंगोत्री नेश्नल हाईवे के नाम पर ही हैं। ऐसी स्थिति में ग्लेश्यरों के मलवों के ऊपर खडे पहाडों को थामने वाली वन संपदा के विनाश की लीला के कारण बहती गंगा में विकास के नाम पर स्वाह करने जैसी तैयारी भविष्य के लिये प्रतीत होती हैं। जिसके लिये भारी असंख्य वन प्रजातियों के विदोहन की योजना हैं। सन 1994-98 के बीच भी इस क्षेत्र में हजारों देवदार के हरे पेडों को काटा गया था । उस समय हर्षिल, मुखवा गाॅव की महिलाओं ने पेडों पर रक्षासूत्र बाॅध कर विरोध किया था। रक्षासूत्र आन्दोलन की पहल पर केन्द्रिय वन एंव पर्यावरण मंन्त्रालय ने एक जाॅच टीम का गठन भी किया था, जिसके उपरान्त दजर््ानों वन कर्मी दोषी पाये गये थे। 


वैसे किसी भी वन रेंज में वनों के विदोहन से पहले स्थानीय गाॅव वालों को भी पूछा जाना चाहिये, लेकिन ऐसा तो वन विभाग कहीं भी नहीं करता हैं। वे इसकी खानापूर्ति के लिये स्थानीय जनप्रतिनिधियों से सूखे पेडों के नाम पर मुहर लगा देतेे हैं। इस क्षेत्र में शायद इसकी जरुरत भी न पडी हों क्योंकि विकास का एजेण्डा हो सकता हैं, लेकिन इससे पहले यह सोचना जरुरी हैं कि संवेदन शील धरती के साथ कितना छेड, छाड किया जा सकता हैं। आवश्यकता से अधिक हुआ हो बाद में आपदा तन्त्र को एलर्ट करने का कोई अर्थ नही होता हैं। अच्छा हो कि किसी संभावित दैबीय आपदा वाले क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन लोंगों के हाथ में देकर वहाॅ के प्राकृतिक संसाधनों के अति दोहन को रोकने में भागीदारी बढायी जा सकती हैं। 


गंगोत्री जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में वन्यजीवों की दुर्लभ प्रजातियाॅ हैं। वनों के कटान के कारण वन्यजीवों का शिकार बहुत आसान हो जाता हैं। यहाॅ के लोग यात्रा सीजन के 6 माह तक ही गाॅव में रहते हैं। शेष शर्दी के महिनों में उत्तरकाशी, डूण्डा, मातली आदि स्थानों पर निवास करते हैं। ऐसी विषम परिस्थिति वाले क्षेत्रों में वनों का वेहिचक अंधाधुन्ध कटान को रोकना भी बहुत चुनौति पूर्ण हैं। उत्तराखण्ड में वन बचाने के लिये चिपको और रक्षासूत्र आन्दोलनों की रिपोर्टो पर गौर करें तो वन विदोहन वाले क्षेत्रों में शराब की थैलियाॅ और कच्ची शराब वनाने और बेचने के धंधे भी जुड जाते हैं। वन माफियाओं को शराव और वन दोनों से लाभ मिलता हैं। इसके साथ ही जडी बूटियों की तश्करी और वन्य जीवों के शरीर के अंगों का अवैध व्यापार भी होता हैं। 


आम तौर पर पहाड की महिलाओं का वनों से दैनिक रिश्ता हैं। वे जितने समय घर में ब्यतीत करती हैं लगभग उतना ही समय वनों से घास, लकडी, पानी लाती हैं।  वनों के बीच में चारा घास और चारापत्ती वाले बृक्ष दोनों से महिलाये रोज अपने मवेशियों को पालते हैं। वनों का निर्मम दोहन चाहे उच्च हो या मध्य हिमालय में दोनों स्थानों पर महिलाओं के काश्त को ध्यान में नहीं रखा जाता हैं। वन विदोहन में लगे मजदूर और ठेकेदार नशें में जंगल की अस्मत को लूटने में माहिर रहते हैं।


कभी कोई महिला संगठन अपने जंगल बचाने की बात करें भी तो, वह भी विकास विरोधी हो जायेगी । देश में यह स्थिति केवल गंगा के उदगम में ही नही बल्कि हिमाॅचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, अरूणाचल, नागालैण्ड, असम, मिजोरम, मणिपुर आदि राज्यों के वनों की हजामत सडकों के चैडीकरण, सूखे पेडों के नाम पर, पर्यटन, जलविघुत  आदि के लिये किया जा रहा हैं। इससे राज्य को करोडों की आमदानी भी हैं। यह ध्यान देना जरूरी हैं कि क्या हरे पेड काटकर बृक्षारोपण करना जरूरी हैं या इसे बचाकर नये वृक्षविहीन स्थानों पर बजट का इश्तेमाल पेड लगाने के लिये होना चाहिये। हिमालयी क्षेत्रों की वन विविधता को ध्यान में रखकर सडकों की चैडाई, छोटी पन विजली, इको टूरिज्म, वन्य जीवों की सूरक्षा वनाधिकार 2006 जैसे विषयों पर पुर्नविचाार की आवश्यकता है। 


लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।