जल की संवेदनशीलता पर जल दोहन की नई योजनाऐं

||जल की संवेदनशीलता पर जल दोहन की नई योजनाऐं||


यहां बता देतें हैं कि 6 अप्रैल, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 'राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना' को स्वीकृति दी थी। यानि जो परियोजना पहले मात्र 13 राज्यों में ही काम करती थी अब यह राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना देशभर में जल के उपयोग और संबर्द्धन के कार्य करेगी। सुखद यह है कि इस परियोजना के माध्यम से देशभर में नदियों के सूखन व प्रदूषित होने की चिन्ता योजनाकारो को बढने लगी। हालांकि इस तरह की योजनाओं का पिछले पांच वर्षो में कोई सफलता की कहानी सामने नहीं आ पायी है।


उल्लेखनीय हो कि इस महत्वकांक्षी योजना में ''जल की महत्ता, उपयोगिता व आवश्यकता'' को जिस तरह से रेखांकित किया गया है, यदि उसी रूप में यह परियोजना जमीनी रूप ले तो देशभर की नदियां निर्मल व अविरल तो बहेगी ही बल्कि पेयजल व अन्य सिंचाई ऊर्जा के साधन स्वस्फूर्त उपलब्ध हो जायेंगे। परियोजना की आत्मा बता रही है कि जल एक ''दुर्लभ'' प्राकृतिक संसाधन है जो जीवन, जीविका, खाद्य सुरक्षा और निरंतर विकास का आधार है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 'राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना' (छंजपवदंस भ्लकतवसवहल च्तवरमबज) के कार्यान्वयन को मंजूरी प्रदान की गई है। बताया गया कि यह 3679.7674 करोड़ रुपये की लागत के साथ एक केंद्रीय योजना होगी जिसमें 3640 करोड़ रुपये 'राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना' के लिए और 39.7674 करोड़ रुपये 'राष्ट्रीय जल सूचना विज्ञान केंद्र' (छॅप्ब्) के लिए होगा। जबकि राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना के कुल आवंटन में से 50 प्रतिशत धनराशि (1839.8837 करोड़ रुपये) विश्व बैंक से ऋण के रूप में प्राप्त होगी। शेष 50 प्रतिशत धनराशि (1839.8837 करोड़ रुपये) बजटीय समर्थन से केंद्रीय सहायता के रूप में प्राप्त की जायेगी। यही नहीं इस परियोजना में 'जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय' के नियंत्रण के अधीन एक स्वतंत्र संगठन के रूप में 'राष्ट्रीय जल सूचना विज्ञान केंद्र' की स्थापना का प्रावधान भी कर दिया गया है।


काबिलेगौर हो कि जल संरक्षण व दोहन की इस योजना के पास ना तो बजट की समस्या है और ना ही क्रियान्वयन की। मगर पांच सालो में राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना ने जल संबधि योजनाओं पर अपना कोई खास असर नहीं छोड़ा है। पत्रकार एवं लेखक नीरज झा का कहना है कि इस विशेष योजना में लोक हित सर्वोपरी है। वे बताते हैं कि 'राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना' ऐसी है कि जल दोहन से पूर्व जल व मौसम संबंधी आंकड़ों को एकत्र करना होगा उसके नकारात्मक व सकारात्मक पहलुओं को परखना होगा जिससे कोई जनहानी ना हो इस तरह से ''जल दोहन'' के लिए कोई योजना क्रियान्वित होगी अथवा जिसका संग्रहण एवं विश्लेषण वास्तविक समय के आधार पर हो सकेगा।


खास बात यह है कि इस परियोजना के तहत संपूर्ण देश को आच्छादित किए जाने की परिकल्पना की गई है जबकि पहले की जल विज्ञान परियोजनाओं के तहत केवल 13 राज्यों को आच्छादित करने की योजना थी। सो राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना आगे बताती है कि इस योजना के मार्फत यथावत जल-मौसम निगरानी प्रणाली तथा जल-मौसम डाटा अधिग्रहण एक खास प्रणाली होगी, राष्ट्रीय जल सूचना विज्ञान केंद्र की स्थापना होगी, जल संसाधन संचालन एवं प्रबंधन प्रणाली विकसित होगी, जल संसाधन संस्थान एवं क्षमता निर्माण के कार्य होंगे और इसके बाद राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना के परिणामों को सूचना विज्ञान केंद्र के माध्यम से आंकड़ों का भंडारण, आदान-प्रदान, विश्लेषण एवं प्रचार-प्रसार के साथ-साथ बाढ़ व जलमग्न क्षेत्रों का मानचित्रण तथा भारत सरकार की प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना एवं अन्य योजनाओं के बेहतर नियोजन तथा आवंटन हेतु नदी घाटी में सतह तथा भूमिगत जल संसाधनों का आकलन करके देखा जायेगा।


जल की चिन्ता व जल के सवाल 
बता दें कि भारत में विश्व की 17.5 प्रतिशत आबादी निवास करती है जबकि भारत के पास विश्व का केवल चार प्रतिशत नवीकरणीय जल संसाधन और विश्व के भू-क्षेत्र का 2.4 प्रतिशत भू-क्षेत्र है। अपने देश में जल विज्ञान के अंतर्गत पूरे 'जल चक्र' (भ्लकतवसवहपब ब्लबसम) का अध्ययन किया जाता है जिसके तहत समुद्र से जल का वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा, भूतल पर जल का प्रवाह तथा जल का समुद्र में वापस जाना आदि सभी क्रियाएं सम्मिलित की जाती हैं। जल के प्रति संवेदनशीलता को देखा जाय तो एक बार फिर 6 मार्च 2016 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में जल-मौसम संबंधी आंकड़ों को एकत्रित करने, बाढ़, जलमग्न क्षेत्रों के मानचित्रण आदि के लिए 'राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना' को स्वीकृति प्रदान की गई।


जबकि इससे पूर्व में भी कई उल्लेखनीय फैसले सामने आये है। ज्ञात हो कि लोगों के मध्य जल का महत्त्व, आवश्यकता एवं संरक्षण के संबंध में जागरूकता बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 1993 से प्रति वर्ष 22 मार्च को 'विश्व जल दिवस' मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र द्वारा '2005-2015' के दशक को भी 'संयुक्त राष्ट्र जीवन के लिए जल दशक' घोषित किया गया था। साथ ही जल एवं स्वच्छता को सतत् विकास लक्ष्यों में छठें लक्ष्य के रूप में शामिल किया गया था।


अनियोजित जल दोहन और अरबों की योजनाऐं
यहां उतराखण्ड में देखिये की जितनी भी जल से संबधित योजनाऐं राज्य में निर्माणाधीन है या प्रस्तावित है, वे सभी स्थानीय लोगो के विरोध का शिकार हो रही है। इस कसमकस में एक तरफ योजनाओं की फिजूलखर्ची बढ रही है तो दूसरी तरफ ये योजनाऐं ना तो समय पर पूरी हो रही है और ना ही पर्यावरण संरक्षण में साबित हो पा रही है। उदाहरण स्वरूप दिनप्रदिन देशभर में पेयजल की समस्या बढ रही है, सिंचाई के लिए पानी की आपूर्ती अधूरी ही रहती है। इसके अलावा अनियोजित जल दोहन के कारण पर्यावरण असन्तुलित होता जा रहा है।


उतराखण्ड में गंगा, यमुना, अलकनन्दा, काली, गौरी, कोसी, मन्दाकिनी, टौंस जैसी नदियों पर निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं के कारण राज्य में आपदाओं की घटनाओं में इजाफा हुआ है। लगभग एक दर्जन जलविद्युत परियोजनाऐं साल 2013 में आपदा की शिकार हुई है। जो अब तक आरम्भ नहीं हो पा रही है। स्थानीय लोगो का कहना है कि जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण से पूर्व परियोजना क्षेत्र का कोई खास अध्ययन होता ही नही है। ना तो अमुक परियोजना क्षेत्र में यह देखा जाता है कि यहां कितनी बसासत रहती है ना ही ऐसा देखा जाता है कि योजना के निर्माण के लिए चयनित जगह आपदाग्रस्त तो नही है। यहां तक कि स्थाानीय लोगो तक को विश्वास में नहीं लिया जाता है।


यही नहीं योजना बनने के कारण पर्यावरण का कितना नुकसान होगा, कैसे भरपाई करनी होगी। इस तरह के मूल सवाल यहां की जल परियोजनाओं से नदारद रहते है। फिर भी जल के दोहन व सरक्षण के लिए सरकारें भारीभरकम योजनाऐ स्वीकृत करने में पीछे नहीं हट रही है।