पर्यटन के झूठे पैर 

चकरौता की दिल दुखाने वाली घटना से सोचना पड़ रहा है कि पता नहीं प्रदेश में किस बूते सुरक्षित पर्यटन की बात हो रही है? पंडित नारायण दत्त् तिवारी के सत्ता संभालते ही जब पूर्णागिरी मेले में पुलिस वालों द्वारा गांव की एक लड़की से सामूहिक दुष्कर्म करने की खबर सुखिर्यों में आई थी तो मैंने उसी वक्त अपने एक लेख में असुरक्षित होते पर्यटन और तीर्थाटन पर चिंता व्यक्त की थी, लेकिन दुखद है कि तब से आज तक हालात सुधरने के बजाए बिगड़ ही रहे हैं।


देहरादून जहां से कि सरकार चलती है, जब वहीं लोग खौफ के वातावरण में जी रहे हैं तो,अन्य जगहों की हालत का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधा की कहीं कोई गारांटी नहीं, लेकिन मुख्यमंत्री हरीश रावत दुनियाभर में चिल्ला रहे हैं कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। सरकार सालभर चार धाम यात्रा चलाने में सक्षम है। क्या वे जवाब देंगे कि केदार घाटी के अस्पतालों में डाक्टर और अन्य व्यवस्थाएं हैं?


हकीकत यह है कि केदारघाटी के प्रमुख केंद्र गुप्तकाशी में ही स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। यहां स्वास्थ्य केंद्र में डाक्टर नहीं हैं। ऐसे में जब स्थानीय मरीजों को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, तो तीर्थ यात्रियों को कहां से दे दोगे। मुख्यमंत्री अपने विज्ञापनों और महानगरों के वातानुकूलित कमरों के जरिये भले ही कुछ भी कह दें, पहाड़ के दर्द और संघर्ष के गीत गाकर तालियां बटोर लें, लेकिन झूठ के पैर नहीं होते। चकरौता और दूरदराज के इलाकों की तो छोडिये राजधानी देहरादून में आए दिन जघन्य अपराध हो रहे हैं। बच्चे तक यहां खौफ में जी रहे हैं।


मुख्यमंत्री के सत्ता संभालने के बाद देहरादून की हालत पर डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (डीसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि मार्च से अक्तूबर तक महज आठ माह की अवधि में राजधानी से 38 बच्चों का अपहरण हुआ। जिनमें से पुलिस अब तक सिर्फ नौ बच्चों को ही घर लौटा सकी है। इन हालात में कैसे पर्यटकों और तीर्थयात्रियों का विश्वास जीत लोगे?