शिक्षक का पतनशील मन

||शिक्षक का पतनशील मन||



 


शिक्षक होने का सबसे बड़ा सुख यह है कि पर्वों, त्योहारों पर विद्यार्थी खूब याद करते हैं। कुछ मिलने आते हैं, कुछ फोन करते हैं और कुछ चलताऊ किस्म के मैसेज भेज कर अपना दायित्व पूरा करते हैं। निजी तौर पर मेरा मानना है कि जिस उत्सव को मनाने का आप का मन है, उसको मनाने पर कोई रोक या बंदिश नहीं होनी चाहिए। पर, पता नहीं क्यों, कुछ औपचारिकताएं अक्सर चुनौती की तरह आ खड़ी होती हैं। आज गुरु पूर्णिमा पर बहुत सारे छात्र-छात्राओं से अलग-अलग माध्यमों के जरिए संवाद हुआ और शाम होते-होते मैं इस दबाव का शिकार हो गया कि अपने छात्रों की शुभकामनाओं के बदले क्या दिया जा सकता है!

 

क्या सच में एक शिक्षक के रूप में मेरे भीतर वह योग्यता, क्षमता पैदा हो गई है कि मैं अब लंबे पैर फैला कर उन्हें छुआते रहने योग्य हो गया हूं ? मेरे महाविद्यालय में एक शिक्षक हैं, फिजिक्स पढ़ाते हैं, अपने विषय के विद्वान आदमी है। वे पिछले कुछ महीने से काफी दबाव महसूस कर रहे हैं। उनसे बात हुई तो उन्होंने कहा कि वे खुद को एक शिक्षक के रूप में सफल महसूस नहीं कर पा रहे हैं। अपने छात्रों के लिए जो करना चाहते हैं, वह कुछ अधूरा है। उनकी इस अनुभूति पर एक लंबी बात हुई, इस विमर्श में हमने किसी शिक्षक की क्षमता, उसकी सीमाओं और अपेक्षाओं आदि पर बातचीत की और आखिर में इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि यदि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच में एक संतुलन का रिश्ता नहीं होगा तो फिर इस रिश्ते में पाखंड अपनी जगह बना लेगा। अंततः दोनों ही विफल हो जाएंगे।

 

पता नहीं, अधिसंख्य छात्र-छात्राओं को ऐसा क्यों लगता है कि वे भले ही क्लास में ना आए, ना पढ़ें, लेकिन शिक्षक के पैर छू लेने या गुरु पूर्णिमा अथवा शिक्षक दिवस पर बढ़-चढ़कर बधाई देने भर से एक शिक्षक और विद्यार्थी का काम पूरा हो जाता है। इस पैमाने पर खुद को देखूं तो मुझे कभी जरूरत महसूस नहीं हुई कि मैं शिक्षक दिवस पर ही अपने शिक्षकों को याद करूं या उन्हें कुछ औपचारिक चीजें अर्पित करूं। बल्कि, मैं हमेशा उन्हें वैसे ही महसूस करता रहा हूँ, जैसे कि अपने पिता को करता हूं। जब जरूरत हुई सलाह मांग ली, दुविधा हुई मार्गदर्शन प्राप्त कर लिया और किसी बात को लेकर द्वंद्व हुआ तो उनके सामने अपना मन खोल कर रख दिया।

 

कभी झिझक नहीं हुई अपने किसी प्रेम संबंध को अपने गुरु के सामने खोल कर रख देने से, अपनी किसी विफलता को ज्यों का त्यों बता देने से या जीवन में आए किसी संकट पर उनसे मदद मांग लेने से। इन सब चीजों में किसी तरह की कोई औपचारिकता ही नहीं रही, आज भी नहीं है। बहुत सारे लोग सुबह से ही व्हाट्सएप या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए कुछ स्टीरियोटाइप मैसेज भेज रहे हैं। कई मामलों में भेजने वाले को भी नहीं पता कि वह उसे क्यों भेज रहा है और सच बात तो यह है कि प्राप्त करने वाले को भी नहीं पता कि इसे क्यों प्राप्त कर रहा है।

 

आज गुरु पूर्णिमा है, पता नहीं क्यों हम लोग गुरु और शिक्षक को एक दूसरे का पर्याय बना देते हैं, जबकि दोनों की भूमिका अलग है। गुरु का काम इस लोक से उस दिव्यलोक तक के बीच पुल बनना है, जबकि शिक्षक का काम वर्तमान को भविष्य के लिए तैयार करना है। शिक्षक का वास्ता किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक और दार्शनिक विकास से उतना नहीं है, जितना कि उसके भौतिक विकास और कौशल पैदा करने से जुड़ा हुआ है। शिक्षक की भूमिका केवल एक वैचारिक धरातल तैयार कर देना और एक कौशल संपन्न नागरिक बना देना ज्यादा है, ना कि आध्यात्मिक प्रश्नों का उत्तर देना।

 

बीते दशकों पर निगाह डालें तो शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता कई तरह की जटिलताओं का शिकार हुआ है। शिक्षा अब उद्योग है, छात्र एक प्रोडक्ट है और शिक्षक एक मैकेनिक है। पैसा इन्वेस्ट किया जा रहा है तो उसका रिटर्न भी जरूरी है। जिसने पैसा इन्वेस्ट किया है वह रिटर्न लेकर या तो खुश है या फिर ना खुश है। एक सुस्थापित डिलीवरी प्रोसेस तैयार हो गया है। इस प्रोसेस में शिक्षक एक पुर्जे की तरह है। मशीन चलती है और पुर्जे के रूप में शिक्षक अपनी भूमिका निभाता है। उस मशीन से कुछ प्रोडक्ट बाहर आते हैं, जिन्हें मार्केट अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करता है। मेंरे लिए यह पीडादायक स्थिति है कि हम इस पूरे प्रोसेस का एक पूर्जा है, जिसे आप चलता-पुर्जा या गलता-पुर्जा, जो भी कह लीजिए।

 

कोई व्यक्ति जिस भौतिक और मानसिक धरातल से निकलकर आता है, वह सारी जिंदगी उसका पीछा करता है। कोई भी ट्रेनिंग या किसी भी तरह का अकादमिक प्रशिक्षण उसकी पृष्ठभूमि को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाता। औपचारिक उत्सव धर्मिता मुझे निजी तौर पर डराती है। यह खास तरह की असहजता पैदा करती है। जिन विद्यार्थियों से मेरा निकट का रिश्ता है, वे सभी जानते हैं कि उन्हें किसी औपचारिक दिन पर मुझे विश करने की जरूरत नहीं है। मेरे लिए बड़ी उपलब्धि यह होगी कि मेरा विद्यार्थी अपने व्यक्तिगत जीवन को किस तरह जी रहा है और अपने संघर्षों के बीच किस तरह रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है।

मुझे गुरु होने से डर लगता है क्योंकि मुझ में वैसी पात्रता नहीं है। इस पात्रता के अभाव में कई बार मेरे जैसा व्यक्ति गुरुडम का शिकार हो जाता है और अंततः वह एक ऐसी दिशा में चला जाता है जहां शिक्षक के रूप में भी उसका पतन अवश्यंभावी है।